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1,127 मौतों के बीच उठे बड़े सवाल, कहां चूका सिस्टम, नेपाल में ग्लेशियर टूटने के 38 मिनट बाद पहुंचा अलर्ट,

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News Star Bharat

, ब्यूरो रिपोर्ट,

काठमांडू। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में ग्लेशियर टूटने (Glacier collapse) के बाद आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड (Flash flood) ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। ताजा आंकड़ों (Latest figures) के मुताबिक, आपदा में अब तक 1,127 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 4,800 से अधिक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। प्रभावित इलाकों और क्षतिग्रस्त हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के लिए खोज और बचाव अभियान जारी है।

इस बीच आपदा को लेकर सबसे बड़ा सवाल नेपाल के अर्ली वार्निंग सिस्टम पर उठ रहा है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने के करीब 38 मिनट बाद प्रभावित इलाकों में अलर्ट मैसेज भेजे गए। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर खतरे की सूचना पहले मिल जाती तो क्या जान-माल के नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता था?

38 मिनट की देरी ने बढ़ाई चिंता

आपदा प्रबंधन विभाग को पहला आधिकारिक अलर्ट मिलने के बाद सुबह 9:15 बजे रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग और चितवन के प्रभावित इलाकों में मोबाइल टेक्स्ट मैसेज भेजे गए।

रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले ही ग्लेशियर टूटने के बाद तेज बहाव वाली बाढ़ निचले इलाकों की ओर बढ़ चुकी थी। पहाड़ी क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड बेहद तेजी से फैलती है, इसलिए चेतावनी जारी करने में 38 मिनट की देरी को लेकर आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

हालांकि, यह भी सामने आया कि अलर्ट मिलने के बाद कुछ लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सका। लेकिन दूर-दराज के कई गांवों तक चेतावनी पहुंचने से पहले ही बाढ़ भारी तबाही मचा चुकी थी।

8:37 बजे रिकॉर्ड हुआ था सिस्मिक डेटा

घटना से पहले नेपाल के खान एवं भूविज्ञान विभाग ने सुबह करीब 8:37 बजे 4.4 तीव्रता का सिस्मिक डेटा रिकॉर्ड किया था। हालांकि, शुरुआती स्तर पर इसे भूकंपीय खतरे के संकेत के तौर पर नहीं देखा गया और सामान्य श्रेणी में रखा गया। इसके चलते तत्काल कोई अलर्ट जारी नहीं किया गया।

इसके बाद करीब 8:50 बजे रसुवा में भोटेकोशी नदी का गेज तेज बहाव में बह गया। यह घटना भी नदी के अचानक बढ़े जलप्रवाह की गंभीरता का संकेत थी।

यानी 8:37 बजे सिस्मिक डेटा दर्ज होने, 8:50 बजे नदी का गेज बहने और 9:15 बजे मोबाइल अलर्ट भेजे जाने के बीच घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ता रहा।

टेलीकॉम टावर भी बने बड़ी बाधा

नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) के अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि कई इलाकों में बाढ़ के शुरुआती झटके में ही टेलीकॉम टावर नष्ट हो गए थे।

इसका सीधा असर चेतावनी व्यवस्था पर पड़ा। जिन क्षेत्रों में संचार ढांचा पहले ही क्षतिग्रस्त हो गया था, वहां लोगों तक समय पर जानकारी पहुंचाना और भी मुश्किल हो गया।

इस वजह से केवल अलर्ट जारी करना ही पर्याप्त नहीं था। उसे प्रभावित गांवों तक पहुंचाने के लिए मजबूत संचार नेटवर्क भी जरूरी था।

क्या नेपाल का अर्ली वार्निंग सिस्टम फेल हुआ?

इस त्रासदी के बाद नेपाल की आपदा चेतावनी व्यवस्था की क्षमता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ग्लेशियर झीलों और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है।

इसके बावजूद नेपाल की चेतावनी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अब भी सामान्य जलस्तर मापने वाले गेज पर निर्भर है। ऐसी स्थिति में ग्लेशियर टूटने या अचानक बड़े पैमाने पर पानी और मलबा नीचे आने जैसी घटनाओं की पहले से पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

1,127 मौतों के बीच जिम्मेदारी का सवाल

1,127 मौतों और 4,800 से ज्यादा लोगों के लापता होने के बाद सबसे अहम सवाल यही है कि इस आपदा में जान-माल का नुकसान कितना प्राकृतिक था और कितना समय पर चेतावनी न मिलने से बढ़ा।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी एक व्यक्ति या विभाग को इन मौतों के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी। लेकिन 38 मिनट की चेतावनी देरी, सिस्मिक डेटा की शुरुआती व्याख्या, नदी गेज के नष्ट होने और टेलीकॉम नेटवर्क के ध्वस्त होने ने नेपाल की आपदा प्रबंधन व्यवस्था की कमजोरियों को जरूर उजागर किया है।

फिलहाल सुरक्षा बलों और राहतकर्मियों का पूरा ध्यान लापता लोगों की तलाश और बचाव पर है। नदी के निचले हिस्सों से लेकर बाढ़ प्रभावित गांवों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों तक लगातार अभियान चलाया जा रहा है।

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